Thursday, 4 August 2011

चतुर्वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा तथा जातिवाद की गंदी राजनीति


चतुर्वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा तथा जातिवाद पर आधारित आरक्षण की गंदी राजनीति

प्राचीन भारत की चतुर्वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा वास्तव में व्यक्ति के प्रकृति प्रदत्त स्वाभाविक गुणों के आधार पर कर्म अथवा व्यवसाय के चयन की व्यवस्था थी, जो सभी व्यक्ति एवं समाज के सर्वतोमुखी सतत निरंतर विकास हेतु सपर्पित संपूर्ण विश्व की सर्वोत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था थी, तथा जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है, तथा सही रूप में जिसका पालन कर आज भी सभी व्यक्ति एवं समाज का सर्वतोमुखी सतत निरंतर विकास संभव है । परन्तु मध्यकालीन भारत में चतुर्वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा की गलत व्याख्या कर उच्च वर्ग के कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने जातिवाद की गंदी राजनीति कर छुआ- छुत को बढावा दिया तथा चतुर्वर्ण व्यवस्था एवम जाति प्रथा का विकृत रूप समाज में पेश किया, जिसका अनुचित लाभ उठाकर वर्त्तमान भारत के परम स्वार्थी दुष्ट राजनीतिज्ञों ने स्वतंत्र भारत में जाति की अग्नि सुलगाकर राजनीति की रोटियां सेंकना शुरु कर दिया और धर्म, नियम, कानून और जनतंत्र के मूल सिद्धान्त, संविधान की मूल आत्मा, स्वतंत्रता आंदोलन के महान उद्देश्य, मानवाधिकार के सिद्धान्त तथा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध "जातिवाद की  गंदी राजनीति पर आधारित आरक्षण" का गंदा खेल खेलना शुरु किया, जो बदस्तूर अब भी जारी है, जिसका खामियाजा सभी व्यक्ति और समाज को ही नहीं अपितु संपूर्ण राष्ट्र और मानव जाति को भुगतना पडा है और भुगतना पड रहा है तथा समाज के एक बहुत बडे वर्ग की शक्ति, सामर्थ्य, क्षमता, योग्यता एवं प्रतिभा व्यर्थ चली गयी तथा व्यर्थ चली जा रही है।  "जातिवाद की  गंदी राजनीति पर आधारित आरक्षण" का गंदा खेल भारतीय संविधान की मूल आत्मा के विरूद्ध है, धर्म, न्याय एवम जनतंत्र के मूल सिद्धान्तों के विरूद्ध है तथा  ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) की समस्या को जन्म दे रहा है,  भारतीय जनमानस के बीच भेद – भाव पैदा कर रहा है, वैमनस्य का विष घोल रहा है तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को विखंडित कर रहा है।


जो व्यक्ति जातिवाद को गालिया देता है और जातिवाद के खिलाफ नारे लगता है, वही व्यक्ति अपने निहित स्वार्थ और फायदे के लिए जातिवाद को समाप्त नहीं होने देता | भारतीय सविधान में अम्बेडकर इफ्फेक्ट और जातिवाद की गंदी राजनीति पर आधारित आरक्षण पद्धति का दुष्परिणाम है कि यदि किसी को मुंह से दुसाध, चमार, धोबी या कुम्हार कह दिया जाये तो वह जघन्य अपराध और नॉन बेलेबुल ऑफेन्स हो जायेगा, लेकिन जाति पर आधारित आरक्षण का लाभ उठाने के लिए वही व्यक्ति घुस देकर भी दुसाध, चमार, धोबी या कुम्हार होने का लिखित प्रमाणपत्र बनवाता है |

प्राचीन भारत में सभ्य समाज को व्यवसाय के आधार पर चार प्रमुख वर्ग या वर्ण में बांटा गया था, यथा- ब्राह्मण वर्ण (बुद्धिजीवी वर्ग), क्षत्रिय वर्ण (योद्धा वर्ग), वैश्य वर्ण (कमाऊ वर्ग) तथा शूद्र वर्ण (श्रमिक वर्ग) । सभ्य समाज को व्यवसाय के आधार पर चार प्रमुख वर्ग या वर्ण में वर्गीकरण को ही चतुर्वर्ण व्यवस्था अथवा वर्ण व्यवस्था का नाम दिया गया ।  ब्राह्मण वर्ण (बुद्धिजीवी वर्ग) के लोग मुख्य रूप से शिक्षक, प्राध्यापक, प्राचार्य, शिक्षाविद, शोधकर्त्ता, वैज्ञानिक, न्यायविद, न्यायाधीश, कानूनी सलाहकार, नीति निर्धारक, चिकित्सक, मंत्री, प्रधान मंत्री, कवि, लेखक, दार्शनिक, समाज सेवक एवम संस्कृतिकर्मी का पेशा या व्यवसाय धारण करते थे तथा इस प्रकार के पेशा या व्यवसाय को धारण करनेवाले समस्त लोगों को ब्राह्मण वर्ण (बुद्धिजीवी वर्ग) की संज्ञा दी गयी, जो अपने बुद्धिबल से समाज को नियंत्रित कर सभी वर्ग के व्यक्ति, समाज, राज्य, राष्ट्र, समग्र मानव जाति तथा संपूर्ण विश्व के सर्वतोमुखी सतत निरंतर विकास के लिये निरंतर कार्य करते हुए निःस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा में समर्पित हुआ करते थे । इसी प्रकार क्षत्रिय वर्ण (योद्धा वर्ग) के लोग मुख्य रूप से राजा, शासक, सैनिक, सेनापति, रक्षक, जन – रक्षक, युद्ध – कला में दक्ष महान योद्धा का पेशा या व्यवसाय धारण करते थे तथा इस प्रकार के पेशा या व्यवसाय को धारण करनेवाले समस्त लोगों को क्षत्रिय वर्ण (योद्धा वर्ग) की संज्ञा दी गयी, जो समाज में शांति एवम कानून एवम व्यवस्था बनाये रखने हेतु समाज पर शासन करते थे तथा बाह्य आक्रमण से राज्य के लोगों को सुरक्षा प्रदान किया करते थे । ठीक इसी प्रकार वैश्य वर्ण (कमाऊ वर्ग) के लोग मुख्य रूप से किसान, पशु पालक, लोहार, सोनार, तेली, बनिया, बढई, बुनकर, दुकानदार, व्यापारी का पेशा या व्यवसाय धारण करते थे तथा इस प्रकार के पेशा या व्यवसाय को धारण करनेवाले समस्त लोगों को वैश्य वर्ण (कमाऊ वर्ग) की संज्ञा दी गयी, जो अर्थोपार्जन कर संपूर्ण समाज तथा समाज के सभी वर्ण या वर्ग के लोगों को धन, भोजन, वस्त्र एवम दैनिक उपयोग की समस्त वस्तु उपलब्ध कराया करते थे । इसी प्रकार शूद्र वर्ण (श्रमिक वर्ग) के लोग मुख्य रूप से खेतिहर मजदूर, औद्योगिक मजदूर, घरेलु नौकर – दाई, कुली, सेवक, अनुसेवक, श्रमिक, सहायक आदि का पेशा या व्यवसाय धारण करते थे तथा इस प्रकार के पेशा या व्यवसाय को धारण करनेवाले समस्त लोगों को शूद्र वर्ण (श्रमिक वर्ग) की संज्ञा दी गयी, जो समाज के सभी वर्ण या वर्ग के लोगों को उनके कार्य मे सहायता प्रदान किया करते थे तथा जो समस्त प्रकार के कृषि, उद्योग, व्यवसाय एवम वाणिज्य व्यापार को आधार प्रदान किया करते थे । इसीलिये उपरोक्त चार वर्णों को उनके कर्मों तथा समाज में उनकी भूमिका एवम उपयोगिता के अनुसार ही ब्राह्मण वर्ण को समाज रूपी शरीर का मस्तक (मस्तिष्क), क्षत्रिय वर्ण को समाज रूपी शरीर की भुजा, वैश्य वर्ण को समाज रूपी शरीर का धड (मुख्य शरीर अर्थात दिल, सीना, पेट, पाचन तंत्र एवम मल – मूत्र विसर्जन तंत्र) तथा शूद्र वर्ण को समाज रूपी शरीर का आधार स्तंभ पैर अथवा पांव (समाज की संपूर्ण शारीरिक ढांचा का आधार स्तंभ) की संज्ञा दी गयी ।

इस सम्बंध में गीता में भगवान कृष्ण का निम्न कथन प्रासंगिक  हैः-

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
अर्थात् हे परन्तप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न उनके गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं ।      गीता- १८.४१

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
अर्थात् अन्तःकरण का निग्रह करना, इन्द्रियों का दमन करना, धर्म पालन के लिये कष्ट सहना, आभ्यंतर शौच एवम बाह्य शौच का पालन कर आंतरिक एवम बाह्य शुद्धि निरंतर बनाये रखना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना; मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल बनये रखना; समस्त प्रकार के वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि का सम्यक् ज्ञान रखना तथा उनमें श्रद्धा रखना, वेद शास्त्रों का अध्ययन – अध्यापन (पठन – पाठन) करना और परमात्मा के तत्व का अनुभव करना – ये सब के सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक गुणों पर आधारित कर्म हैं ।      गीता – १८.४२

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥
अर्थात् शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव – ये सब के सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक गुणों पर आधारित कर्म हैं ।      गीता – १८.४३

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥
अर्थात् कृषि (खेती), गोपालन और क्रय – विक्रय का व्यापार स्वरूप सत्य व्यवहार – ये सब के सब ही वैश्य के स्वाभाविक गुणों पर आधारित कर्म हैं ।      इसी प्रकार सभी वर्ण के लोगों की सेवा कर उनके कार्यों में हर संभव सहयोग करना शूद्र के स्वाभाविक गुणों पर आधारित कर्म हैं ।      गीता – १८.४४

यहां यह भी स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि ब्राह्मण वर्ण के साथ साथ सभ्य समाज के सभी वर्ग के सभी लोगों को आभ्यंतर शौच (आन्तरिक शुद्धि) एवम बाह्य शौच (बाहरी शुद्धि) – दोनों प्रकार के शौच (शुद्धि) का पालन करना चाहिये । ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, पूर्वाग्रह, पक्षपात, भय, घृणा और अहंकार – इन दस प्रकार के मानव दुर्गुणों से मुक्त होना ही आभ्यंतर शौच (आंतरिक शुद्धि) कहलाता है । हाथ, पैर, मुंह, नाक, दांत, जीभ, चेहरा, माथा, जननांग, मल – मूत्र विसर्जन अंग, सम्पूर्ण शरीर, वस्त्र, बिछावन, निवास स्थान आदि की नित्य प्रति निरंतर सफाई ही बाह्य शौच (बाहरी शुद्धि) कहलाता है ।
     
प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था अथवा चतुर्वर्ण व्यवस्था के अतिरिक्त पेशा अथवा व्यवसाय के नाम के अनुसार जाति व्यवस्था भी प्रचलित थी । वस्तुतः पेशा अथवा व्यवसाय के नाम को ही जाति की संज्ञा दी गयी थी, जिसके अनुसार लोहा का काम करने वाले को लोहार, चमडा का काम करने वाले को चमार (चर्मकार), लकडी का काम करने वाले को बढई, मिट्टी का बर्तन बनाने वाले को कुम्हार (कुम्भकार), गाय (गौ) पालन करने वाले को ग्वाला की संज्ञा दी गयी ।

यह बात एक निर्विवाद त्रिकाल सत्य है कि माता – पिता के सद्गुण एवम दुर्गुण आनुवंशिक (जेनेटिक) रूप से उनके पुत्र एवम पुत्रियों में हस्तांतरित हो जाते हैं, जो किसी भी व्यक्ति के समस्त गुण और व्यक्तित्व का ३० % निर्धारित करते हैं, व्यक्ति के शेष ३० % गुण एवम व्यक्तित्व के निर्धारण में उनके परिवार का माहौल (वातावरण, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय, नैतिक मूल्य, परंपरा, संस्कृति) मुख्य भूमिका निभाते हैं, तथा व्यक्ति के शेष ४० % गुण एवम व्यक्तित्व के निर्धारण में उनकी शिक्षा एवम शैक्षणिक संस्थान का माहौल तथा उनके इर्द गिर्द सामाजिक परिवेश का माहौल (वातावरण, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय, नैतिक मूल्य, परंपरा, संस्कृति) मुख्य भूमिका निभाते हैं । यह बात भी एक निर्विवाद त्रिकाल सत्य है कि जो व्यक्ति जिस परिवार मे पैदा होता है, उस परिवार में माता – पिता के पेशा एवं व्यवसाय के कार्यों को बचपन से ही देखते समझते तथा उन कार्यों में सहयोग करते करते १८ – २० साल की उम्र होते – होते वह व्यक्ति बिना किसी विशेष शिक्षण अथवा प्रशिक्षण के, अपने परिवार के व्यवसाय मे तथा व्यावसायिक दक्षता में उस स्तर की पूर्ण महारत हासिल कर लेता है, जिसे कोइ दूसरे व्यवसाय को धारण करने वाले दूसरे परिवार मे जन्मा व्यक्ति ५ – ६ साल की विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के बावजूद भी हासिल नहीं कर सकता । यह बात भी एक निर्विवाद त्रिकाल सत्य है कि प्रत्येक माता – पिता की चाहत होती है कि जिस व्यवसाय को उसने अपनाया है तथा जिस व्यवसाय को सफल बनाने और उसे अधिकतम संभव ऊंचाई तक ले जाने के लिये उसने जीवन भर कठिन परिश्रम किया है, उस व्यवसाय को उसके उत्तराधिकारी वंशज भी अपनायें तथा उसे और आगे बढायें । इसीलिये पीढी – दर – पीढी निरंतर लोग अपने परिवार मे माता – पिता के व्यवसाय को ही अपनाने लगे तथा व्यावसायिक कार्यों में परस्पर सहयोग एवम सहुलियत के लिये लोग अपने ही पेशा या व्यवसाय (जाति) के लडका – लडकी से विवाह करने लगे तथा समान पेशा या व्यवसाय के लोग एक साथ एक मोहल्ला या टोली बनाकर रह्ने लगे, जिससे भिन्न - भिन्न पेशा या व्यवसाय के लोगों ने अपनी विशेष प्रकार की व्यावसायिक कार्य संस्कृति को जन्म दिया, जिससे जाति प्रथा का विकास हुआ और इसी जाति प्रथा के कारण भारत मे समस्त प्रकार के उच्च स्तरीय ज्ञान – विज्ञान, कला – तकनीक एवम सम्पूर्ण विश्व की सर्वोत्कृष्ट सभ्यता - संस्कृति का विकास हुआ, जिसने सम्पूर्ण विश्व में उच्च स्तरीय ज्ञान – विज्ञान, कला – तकनीक एवम सभ्यता – संस्कृति को विकसित किया तथा सम्पूर्ण विश्व की सभ्यता – संस्कृति को प्रभावित किया ।

प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति अत्यन्त ही उन्नत, सार्थक एवम पूर्णरूपेण व्यावहारिक थी । सुप्रसिद्ध ॠषियों (प्राध्यापक, शिक्षाविद, चिकित्सक, वैज्ञानिक एवम दार्शनिक) द्वारा घने जंगलों में प्राकृतिक वातावरण में चलाये जाने वाले ॠषि आश्रम (आदर्श शिक्षण संस्थान, शोध संस्थान एवम वैज्ञानिक प्रयोगशाला)) में सुयोग्य व्यक्तियों को समस्त शस्त्र एवम शास्त्र (धर्म शास्त्र, व्यवहार विज्ञान, नीति शास्त्र, राजनीति शास्त्र, गणित, विज्ञान, खगोल शास्त्र, युद्ध कला, धनुर्विद्या, सैन्य शास्त्र आदि) की शिक्षा एवम व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर सभी छात्रों को व्यावहारिक जीवन की समस्त परिस्थितियों का सामना करते हुए सफल जीवन जीने की कला में पारंगत किया जाता था तथा ॠषि आश्रम में ब्राह्मण ॠषि द्वारा निःस्वार्थ भाव से सभी धनी एवं गरीब छात्रों को बिना किसी भेद भाव के एक समान निःशुल्क भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा एवम प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था । ॠषि आश्रमों में छात्र – छात्राओं के समस्त अन्तर्निहित गुणों, शारीरिक एवम मानसिक शक्तियों तथा उनकी प्रतिभा का समग्र रूप में विकास कर उन्हें व्यावहारिक जीवन की परिस्थितियों का तथा दुष्ट प्रकृति के राक्षस प्रवृत्ति के लोगों का सफलतापूर्वक सामना करने में सक्षम बनाया जाता था । इसीलिये समाज में ब्राह्मण (बुद्धिजीवी शिक्षक) एवम ॠषि (आदर्श शिक्षण संस्थान, शोध संस्थान एवम वैज्ञानिक प्रयोगशाला के संचालक सुप्रसिद्ध प्राध्यापक, शिक्षाविद, चिकित्सक, वैज्ञानिक एवम दार्शनिक) को बहुत ही आदर की दृष्टि (नजर) से देखा जाता था तथा प्रत्येक प्रकार के पूजा- पाठ एवम यज्ञ की समाप्ति के समय ब्राह्मण एवम ॠषि को आवाहन (सादर आमंत्रित) कर के समाज के सभी वर्ग के लोग यथा संभव सर्वाधिक चल एवम अचल सम्पत्ति तथा नकद धन राशी उन्हें समर्पित करते थे ।

इतिहास साक्षी है - दुष्ट प्रवृत्ति के परम स्वार्थी तत्वों ने हमेशा ही समाज की हर व्यवस्था का दुरुपयोग किया है, तथा जिस किसी जाति, पेशा, व्यवसाय, रूप, वस्त्र या पह्नावा को समाज के लोगों ने सम्मान दिया, उसी जाति, पेशा, व्यवसाय, रूप, वस्त्र या पह्नावा को धारण कर ऐसे दुष्ट प्रवृत्ति के परम स्वार्थी तत्वों ने हमेशा ही समाज को तथा समाज के भोले भाले लोगों को ठगा है और यह प्रक्रिया आज भी बदस्तुर जारी है । पूर्व काल में चूंकि समाज में ब्राह्मण और ॠषि को लोग बहुत आदर कि दृष्टी से देखते थे, इसलिये दुष्ट प्रवृत्ति के परम स्वार्थी तत्व हमेशा समाज में आदर पाने के लिये तथा समाज के लोगों की आंखों मे धूल झोंककर अपने गलत इरादों को और गलत कार्यों को अन्जाम देने के लिये ब्राह्मण और ऋषि क रूप धारण किया करते थे । ठीक उसी प्रकार आज के जमाने में भी दुष्ट प्रवृत्ति के परम स्वार्थी तत्व हमेशा समाज में आदर पाने के लिये तथा समाज के लोगों की आंखों मे धूल झोंककर अपने गलत इरादों को और गलत कार्यों को अन्जाम देने के लिये दुष्ट प्रवृत्ति के अदूरदर्शी परम स्वार्थी तत्व वर्त्तमान व्यवस्था की खामियों का लाभ उठाकर बुद्धिजीवी वर्ग (अर्थात् शिक्षक, प्राध्यापक, प्राचार्य, शिक्षाविद, शोधकर्त्ता, वैज्ञानिक, न्यायविद, न्यायाधीश, कानूनी सलाहकार, नीति निर्धारक, चिकित्सक, मंत्री, प्रधान मंत्री, कवि, लेखक, दार्शनिक, समाज सेवक एवम संस्कृतिकर्मी आदि) का पेशा अपना कर हर बात की गलत व्याख्या कर लोगों को उल्लू बनाकर अपने स्वार्थ की सिद्धि कर रहे हैं तथा समाज में विष वमन कर समाज मे वैमनस्य फैला रहे हैं ।

अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत स्वतंत्र भारत में शासन चलाने के लिये सत्ता में दुष्ट प्रवृत्ति के परम स्वार्थी तत्वों का समावेश हो गया, जो सस्ती लोकप्रियता बनाये रखने और निरंतर सत्ता मे अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये “फूट डालो और शासन करो” की नीति अपनाते रहे तथा जाति और मजहब की अग्नि सुलगाकर राजनीति की रोटियां सेंकने में निरंतर भिडे रहे और आज भी भिडे हुए हैं । स्वतंत्र भारत में अलग – अलग मजहब के लोगों के लिये अलग अलग कानून बनाये गये – हिन्दू एवम मुसलमान के लिये अलग अलग कानून की व्यवस्था की गयी तथा हर क्षेत्र में जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की गयी, जिसे भारतीय संविधान में “अम्बेडकर इफेक्ट” के रूप मे जाना जाता है, जो भारतीय संविधान की मूल आत्मा के विरूद्ध है, जो धर्म, न्याय एवम जनतंत्र के मूल सिद्धान्तों के विरूद्ध है, जो पंथ निरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) के सिद्धान्तों के विरुद्ध है, जो भारतीय जनमानस के बीच वैमनस्य का विष घोलता है, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को विखंडित करता है, जो अयोग्यता एवं अक्षमता को प्रोत्साहित करता है, जो प्रतिभाशाली व्यक्तियों की योग्यता, क्षमता, प्रतिभा, शक्ति एवम दक्षता को कुंठित करता है तथा उनका समाज एवम राष्ट्र के सर्वतोमुखी सतत् निरंतर विकास में सदुपयोग नहीं होने देता है तथा जो प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) की समस्या का जन्मदाता है, जो समाज एवम राष्ट्र के सर्वतोमुखी सतत् निरंतर विकास में सबसे बडी बाधा है ।

जो भी व्यक्ति विकास की दौड में पीछे रह गये हैं, जो शैक्षणिक, सामाजिक एवम आर्थिक रूप से पिछडे हुए हैं, उन सभी व्यक्तियों को व्यक्तिगत पिछडेपन के आधार पर तमाम प्रकार की हर संभव सुविधा प्रदान कर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल कर उनके सर्वतोमुखी सतत निरंतर विकास का मार्ग प्रशस्त करना चाहिये । परंतु किसी भी रूप में जाति, सम्प्रदाय, मजहब, भाषा, नस्ल, रंग, स्थान, क्षेत्र आदि के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेद- भाव नहीं किया जाना चाहिये । किसी भी रूप में जाति, सम्प्रदाय, मजहब, भाषा, नस्ल, रंग, स्थान, क्षेत्र आदि के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेद- भाव अथवा जाति पर आधारित आरक्षण की पद्धति भारतीय संविधान की मूल आत्मा के विरूद्ध है, धर्म, न्याय एवम जनतंत्र के मूल सिद्धान्तों के विरूद्ध है तथा पंथ निरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) के सिद्धान्तों के विरुद्ध है, जो भारतीय जनमानस के बीच भेद – भाव पैदा करता है तथा वैमनस्य का विष घोलता है, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को विखंडित करता है।

कृष्ण बल्लभ शर्मा “योगीराज”
(“चतुर्वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा तथा जातिवाद की गंदी राजनीति” नामक पुस्तक से उद्धृत)
By- Krishna Ballabha Sharma "Yogiraj" 
Advocate (Lawyer), Patna High Court, Patna (India) 

Author of the Books Entitled : 
Basic Principles of Dharma, Justice and Democracy
History Maker (Collection of Life Inspiring English Poems)
Neo- Socialism and Sustainable Development
Noble Qualities of Lawyers and Judges
Philosophy of Life and Love
इतिहास रचयिता (प्रेरणादायक हिन्दी काव्य संकलन)
धर्म, न्याय एवं जनतंत्र के मूल सिद्धांत
जीवन दर्शन और प्रेम दर्शन

Founder and Chairman: Krishna Foundation (Trust)
Founder and Chairman: Human Rights Protection Committee
Founder and President: Rashtriya Nava Nirman Parishad
Founder and President: Dignified Brahman Association of India
Founder and President: Dignified Lawyers Association of India

Sunday, 31 July 2011

History Maker


HISTORY MAKER

History maker is the man,
Who is criticized by others.
But who does those things,
Which are not done by others.

He takes bold initiatives,
And is criticized by others,
As he does those things,
Which are not done by others.

He works with his might,
While others are sleeping,
He dares at the time,
While others are fleeing.

He is never afraid of problems,
And smiles even while suffering.
He makes his way in difficult terrains,
And remains always bold and daring.

He is never afraid of difficulties,
And never waits for good opportunities.
He marches forward against the wind,
And creates good opportunities.

He never imitates others,
And he never repeats history.
He is called as history maker,
As he creates new history.

He works with firmness
Of is body and mind,
But within his heart,
He is very very kind.

History maker is the man,
Whose people become fan,
Who wins battles of his life,
As he knows that he can.

History maker is the man,
Who is praised by others,
As he does those things,
Which are not done by others.

      -- Krishna Ballabha Sharma “Yogiraj”
(Quoted from the book entitled “History Maker”)

Nothing is Impossible


NOTHING IN THIS WORLD IS IMPOSSIBLE

“Nothing in this world is impossible,
For a man of firm determination.
Nothing in this world is beyond the reach,
            Of a man of firm conviction.
Even great mountains crumble away or give way,
To a man of iron will.
Bold initiator leads the world,
             While the procrastinators and dullards
             Remain indecisive standing still.
Come on my friends, gird up your loins and march ahead,
             The whole of the world is waiting for you.
You are bound to succeed in your chosen field of work
The blessings of Lord Almighty are always available to you.”
                             
                  -- Krishna Ballabha Sharma “Yogiraj”
                  (Quoted from the book entitled “History Maker”) 

Monday, 25 July 2011

अपना परिचय मैं क्या दूं ?


अपना परिचय मैं क्या दूं ?

जो परिचय मेरा मुझसे पूछें,
उनको उत्तर मैं क्या दूं ?
जो पाते कहते लोग मुझे,
अपना परिचय मैं क्या दूं ?

कृष्ण हमारा नाम भले,
पर माखनचोर हूं कहलाया ;
छलिया लोगों ने नाम दिया,
और मैं रणछोड भी कहलाया ।

माखन चुराता, झूठ बोलता,
छल भी करता आया हूं ;
करने धर्म की स्थापना
मैं इस धरा पर आया हूं ।

धर्म सत्य है इस धरा पर,
इसके सिवा कुछ सत्य नहीं ;
जो धर्म न पालन करता हो,
वह पालन करता सत्य नहीं ।

धर्म विजय उद्देश्य हमारा,
धर्म की रक्षा मैं करता ;
न्याय का पालन धर्म समझ
निर्दोष की रक्षा मैं करता ।

धर्म विजय की ही खातिर
मैं झूठ बोलता आया हूं ;
और धर्म की रक्षा की खातिर
मैं छल भी करता आया हूं ।

योगी भी हूं, भोगी भी हूं,
सुंदरता का प्रेमी हूं ;
प्रेम पुजारी बनकर हरदम,
प्यार सबों से करता हूं ।

आवारा, पागल, दीवाना –
कुछ इतना सुंदर नाम मिला;
सनकी, बहरा, गूंगा बना,
पर नहीं किसी से हमें गिला ।

प्रेमी, रसिया, छलिया कहा,
योद्धा, लडाका कह दिया ;
जिसने जो पाया कह डाला,
हमने सब कुछ स्वीकार किया ।

मैं काम कला में बन प्रवीण,
इस जीवन का सुख भोग किया ;
और जीवन के हर क्षेत्र में
हर नारी का सम्मान किया ।

यूं तो जीवन में मैं कभी
किसी पर क्रोध नहीं करता ;
पर दोषी को दंडित करने को
मैं उग्र रूप धारण करता ।

गुनाह की माफी जो मांगें,
मैं माफ उन्हें कर देता हूं ।
पर चाल चले जो कोई अगर,
तो माफ न उनको करता हूं ।

एक भला बेचारा आदमी
मूर्ख और बेवकूफ भी कहलाया ;
देवता आदमी कहलाया
और पागल भी मै कहलाया ।

वाक्युद्ध लडा मैंने, और
कलम से लडता आया हूं ;
हथियार चलाना मैं सीखा
जीवन भर लडता आया हूं ।

जिसका भी स्वार्थ नहीं सधता,
वह मेरी शिकायत करता है ;
जिसकी भी बात नहीं मानूं,
वह मेरी निंदा करता है ।

व्यंग्य बाण सहा लोगों का,
अपना खुद उपहास सहा ;
नहीं शिकायत हमें किसी से,
कुछ नहीं किसी से कभी कहा ।

लोगों ने गाली हमें दिया,
रोडा भी हमपर बरसाया ;
कई वार हुए मेरे तन पर,
यह थी सब ईश्वर की माया ।

ईर्ष्या नफरत सब झेल के भी
मैं प्यार सबों को देता हूं,
कष्ट भले मैं खुद झेलूं,
लोगों का दुख हर लेता हूं ।

मौत के साये में पलकर
नन्हे बालक से हुआ जवान,
षड्यंत्रों के बीच पला पर
बनी रही है मेरी शान ।

अन्यायी अत्याचारी से लडा
अकेला कई लोगों से लडा,
आगे बढकर भी मैं लडा
और पीछे हटकर भी लडा ।

तन से, मन से, धन से हरदम
राक्षस से लडता मैं आया,
कई जंग भले जीते हमने
डरपोक और कायर कहलाया ।

धर्म नियम की व्याख्या कर
मैं गीता का उपदेश भी देता,
युद्ध की शिक्षा मैं देता
पर शांति का संदेश देता ।

न्यायविद और शिक्षाविद
की भी उपाधि मैं पाया,
कई लोगों ने कई नाम दिये
विद्वान कवि भी कहलाया ।

अध्यात्म की चर्चा मैंने की
अध्यात्म गुरू भी कहलाया,
योगी का जीवन मैं जीता
और योगीराज भी कहलाया ।

ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ को,
घृणा, मोह, भय, अहंकार को,
पूर्वाग्रह को, पक्षपात को,
त्यागा इन मानव दुर्गुणों को ।

व्याख्या कनून की करता, और
मानवाधिकार कि रक्षा करता हूं,
लोगों को न्याय मिले इस खातिर
हरदम न्यायालय में लडता हूं ।

कर्त्तव्य निभाने मैं आया
कर्त्तव्य निभाता जाउंगा,
जो चहें मुझको लोग कहें
अपना कर्त्तव्य निभाउंगा ।

मामूली – सा इन्सान हू मैं
इन्सान ही बनकर जीता हूं,
प्यार की वर्षा सबपर करता
प्रेम का रस मैं पीता हूं ।

तन- मन लचीला है मेरा
मैं सबकी बातें सुनता हूं,
पर करता केवल वही सदा
जिसको मैं उचित समझता हूं ।

इन्सानी आदर्शों की स्थापना
अपने जीवन से करता हूं,
जो चहता कि लोग करें
उनका पालन खुद करता हूं ।

      n     कृष्ण बल्लभ शर्मा “योगीराज”
(“इतिहास रचयिता” नामक पुस्तक से उद्धृत)

ओ वीर ! जरा साहस कर देखो


ओ वीर ! जरा साहस कर देखो
ओ वीर ! जरा साहस कर देखो,
आगे कदम बढा कर देखो ।
            दुख – दर्द हवा हो जायेंगे,
            गम के बादल छंट जायेंगे,
            सफलता चूमेगी कदम,
और शूल फूल बन जायेंगे ।
हाथ पर हाथ धर बैठे रहना कायरता है ।
साहस कर जो बढे न आगे, जीता जी भी मरता है ।

ओ वीर ! जरा साहस कर देखो,
आगे कदम बढा कर देखो ।
            पर्वत की चोटियां झुक जायेंगी,
राहों में फूल – कली बिछ जायेंगे,
सागर देगा राह तुम्हें,
और लोग देख हर्षायेंगे ।
सागर की असंख्य लहरों को देख तुम्हें न डरना है ।
सामना तो एक बार में एक लहर का ही करना है ।

ओ वीर ! जरा साहस कर देखो,
आगे कदम बढा कर देखो ।
            तरी खोल हिम्मत करोगे,
            राह खुद बन जायेगा,
सागर की छाती चीर बढो तुम,
मंजिल तुम्हें मिल जायेगा ।
चोट खाकर हिम्मत हार जाना मूर्खता है,
वीर हार में जीत रहस्य का ढूंढता है ।

ओ वीर ! जरा साहस कर देखो,
आगे कदम बढा कर देखो ।
            हार जीत बन जायेगी,
            बिछडे भी गले लगायेंगे,
            फतह जब मंजिल कर लोगे,
            आलोचक प्रशंसक बन जायेंगे ।
परम साहसी की सदा ही होती जय – जयकार है ।
पूजा जाता वह जग में, वह आदर का हकदार है ॥
n     कृष्ण बल्लभ शर्मा “योगीराज”
(“इतिहास रचयिता” नामक पुस्तक से उद्धृत)

ओ मेरे प्यारे जीना सीख


ओ मेरे प्यारे जीना सीख
ओ मेरे प्यारे जीना सीख,
आज के आज में रहना सीख ।

जो गुजर गया सो गुजर गया,
अब सोंच के उस पर होगा क्या ?
जो होना है सो होना है,
चिन्ता करने से होगा क्या ?
ओ मेरे प्यारे जीना सीख,
आज के आज में रहना सीख ।

जो मौत सभी की निश्चित है,
तो मौत से है फिर डरना क्या ?
(अ)गर लडे बिना हो जीना मुश्किल,
कदम – कदम पर लडना सीख ।
ओ मेरे प्यारे जीना सीख,
आज के आज में रहना सीख ।

हो कलम कभी कमजोर नहीं,
तलवार चलाना पर तू सीख,
गांधी की अहिंसा बनी रहे,
हिंसक प्राणी से लडना सीख ।
ओ मेरे प्यारे जीना सीख,
आज के आज में रहना सीख ।

जीवन फूलों की सेज नहीं,
मुश्किल के कांटे भरे पडे,
मुश्किल से उफ् तू करना नहीं,
हर मुश्किल से तू लडना सीख ।
ओ मेरे प्यारे जीना सीख,
आज के आज में रहना सीख ।

हों गम के बादल घेर खडे,
पर रोने से फिर होगा क्या ?
हां, हंसी तेरे गम छांटेगी,
हर हाल में अब तू हंसना सीख ।
ओ मेरे प्यारे जीना सीख,
आज के आज में रहना सीख ।
n     कृष्ण बल्लभ शर्मा “योगीराज”
(“इतिहास रचयिता” नामक पुस्तक से उद्धृत)

जिंदगी ऐसे जियो


जिंदगी ऐसे जियो
जिंदगी को तुम अपने कुछ इस तरह जियो,
कि अपनी जिंदगी कैसे जिये – इस बात का,
फिर कभी, कोई पछतावा न हो ।

हर बात अपनी जिंदगी मे इस तरह बोला करो,
कि कोई बात कैसे, कब, कहां, क्या बोल गये – इस बात का,
फिर कभी, कोई पछतावा न हो ।

हर काम अपनी जिंदगी में इस तरह किया करो,
कि कोई काम कैसे, कब, कहां, क्यों कर गये – इस बात का,
फिर कभी, कोई पछतावा न हो ।

इस्तेमाल अपनी जिंदगी के वक्त का ऐसे करो,
कि कौन वक्त हो गया बेकार क्यों – इस बात का,
फिर कभी, कोई पछतावा न हो ।

हर किसी से जिंदगी में बर्ताव तुम ऐसे करो,
कि बर्ताव किससे, कब, कहां, कैसे किये – इस बात का,
फिर कभी, कोई पछतावा न हो ।

जिंदगी में हर किसी से इस तरह तुम मिला करो,
कि कब, कहां और किससे तुम कैसे मिले – इस बात का,
फिर कभी, कोई पछतावा न हो ।
n     कृष्ण बल्लभ शर्मा “योगीराज”
(“इतिहास रचयिता” नामक पुस्तक से उद्धृत)